5 Просить у мертвого чтоб он попросил Аллаха — ширк

Posted on Апрель 24, 2012

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Просить у мертвого чтоб он попросил Аллаха — ширк
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Во имя Аллаха, Милостивого, Милосердного.
Хвала Аллаху Господу миров, мир и благословение нашему пророку Мухаммаду, его семье и его сподвижникам.

А затем.

Просить у мертвых, стоя у их могилы и неся в себе убеждение, что они слышат, таким образом, чтоб они попросили Аллаха — это ширк, который выводит человека из религии Аллаха, и это правильное мнение в правильности которого нет сомнения. А нововведение, то например это когда просишь Аллаха рядом с могилой какого-то мертвого думая, что так дуа примется быстрее, а обращение к самому мертвому, чтоб он обратился к Аллаху, это ширк который выводит из религии, и это один из тех видов ширка за который пророк сделал халялем имущество и кровь мушриков.

Я набросал эту статью за короткий промежуток времени, по причине занятости и постараюсь если найду время подробно объяснить этот момент, так как вижу в нем запутывание у мусульман.

У Шейхуль ислама есть слова что это — бида, и эти его слова стали фитной и причиной недопонимания для некоторых, однако есть ясные, четкие слова шейхуль ислама в частности в «Иктидо сырот аль мустакым» во втором томе, где он четко говорит, что это ширк.

Вот некоторые слова ученых по этому вопросу:

كلام الشيخ سليمان العلوان -حفظه الله- في شرحه تجريد التوحيد للمقريزي -رحمه الله : — من يقول للميت ادعُ الله لي أو ادعُ لنا ربك هذا محرم بإجماع المسلمين .وقد جعله جماعة من العلماء شركاً أكبر لقوله تعالى: } والذين تدعون من دونه ما يملكون من قطمير * إن تدعوهم لا يسمعوا دعائكم ولو سمعوا ما استجابوا لكم ويوم القيامة يكفرون بشرككم { .ولقوله تعالى عن المشركين: } ما نعبدهم إلا ليقربونا إلى الله زلفى { ولقوله تعالى: } ومن يدع مع الله إله آخر لا برهان له به فإنما حسابه عند ربه إنه لايفلح الكافرون {، وغير ذلك من الأدلة العامة .وكون هذا شرك أكبر هو ظاهر كلام المؤلف هنا

Вот слова шейха Солиха Али Шейх в комментарии на «Кашф шубухат» он объясняет что это — большой ширк:

يقول الشيخ صالح آل الشيخ في شرحه لكشف الشبهات :- قال- أي شيخ الإسلام محمد ابن عبد الوهاب — (فإن قال- أي المشرك-: النبي أُعطي الشفاعة وأنا أطلبه مما أعطاه الله تعالى.) فالجواب: أن الله أعطاه الشفاعة ونهاك عن هذا- يعني نهاك عن طلب الشفاعة -فقال سبحانه ﴿وَأَنَّ الْمَسَاجِدَ لِلَّهِ فَلا تَدْعُوا مَعَ اللَّهِ أَحَدًا﴾[الجن: 18]، فإذا كنت تدعو الله أن يشفّع نبيّه فيك فأطعه في قوله: ﴿فَلاَ تَدْعُوا مَعَ اللَّهِ أَحَدًا﴾) وهذا دليل وبرهان سديد للغاية.كما ذكرت لك أن الشفاعة طلب والشفاعة هي الدعاء، فإذا طلب أحد من النبي وهو في البرزخ -مع حياته الكاملة عليه الصلاة والسلام أكمل من حياة الشهداء عليه الصلاة والسلام- إذا طُلب منه أن يشفع، فهذا الطالب سأله والسؤال دعاء، فحقيقة طلب الشفاعة أنها دعوة الميت -سؤال الميت-، سؤال النبي عليه الصلاة والسلام في قبره وهو في الرفيق الأعلى عليه الصلاة والسلام، سؤاله ودعاؤه وقد طلب منه، فإذا قال القائل: يا محمد، يا رسول الله اشفع لي. فقد دعاه وطلب منه، إذا قال: يا محمد، يا رسول الله اسأل الله لي. فقد سأله وطلب منه عليه الصلاة والسلام، وهذا طلب الدعاء ممن ليس في الحياة الدنيا ممن هو عند الله جل وعلا، والله سبحانه نهانا أن ندعوا أحدا غيرَه فقال جل وعلا (وَأَنَّ الْمَسَاجِدَ لِلَّهِ فَلا تَدْعُوا مَعَ اللَّهِ أَحَدًا)، وقوله (فَلا تَدْعُوا) هذا نهي، نهانا عن الدعاء. ومن المعلوم المتقرر في الأصول أنَّ الفعل المضارع لاشتماله على مصدر ينزل منزلة النكرة في سياق النهي أو النفي فتعم أنواع الدعاء، (فَلا تَدْعُوا) هذا يعم جميع أنواع الدعاء؛ لا يدعى مع الله أحدا؛ دعاء استغاثة، دعاء استعانة، دعاء استسقاء، دعاء شفاعة، دعاء نذر إلى آخره، فجميع هذه الأنواع داخلة في النهي في قوله جل وعلا (فَلا تَدْعُوا) دعاء العبادة ودعاء المسألة، وكذلك دلّت الآية على عموم آخر وهو قوله جل وعلا (فَلا تَدْعُوا مَعَ اللَّهِ أَحَدًا)؛ لأن (أَحَدًا) نكرة جاءت في سياق النهي فدلت على عموم كلِّ أحد، فالملائكة لا يدعون والأنبياء والرسل عليهم صلوات الله وسلامه لا يُدعون، وكذلك الصالحون ممن انتقلوا عن الدنيا لا يُدعون، والأولياء الأموات لا يُدعون، والشهداء شهداء المعركة لا يُدعون أيضا.

Здесь Шейх Солих был спрошен про слова Шейуль ислама о том что это бида:

س/ هذا سائل يقول: مهم. جعل الكتابة بالقلم الأحمر عشان تصير خطر يعني، يقول: ما رأيك فيمن ينسب لشيخ الإسلام ابن تيمية أن سؤال الميت أن يدعو الله لك ليس من الشرك الأكبر بل هو بدعة؟ ج/ هذا جاء في كلام شيخ الإسلام صحيح لكن البدعة يريد بها البدعة الحادثة؛ يعني التي حدثت في هذا الأمة، وليس مراده رحمه الله بالبدعة أنها البدعة التي ليست شركا لأن البدع التي حدثت في الأمة منها بدع كفرية شركية ومنها بدع دون ذلك فإذن قوله: وأما سؤال الميت أن يدعو الله للسائل فإنه بدعة. يعني هذا حدث في هذه الأمة حتى أهل الجاهلية ما يفعلون هذا، ما يقولون أدعو الله لنا، إنما يقولون اشفع لنا. فمسألة أن يطلب من الميت الدعاء هذه بدعة حدثت، حتى المشركين ليست عندهم، وأهل الجاهلية ليست عندهم بل حدثت في هذه الأمة، وإنما كان عند أهل الجاهلية الطلب بلفظ الشفاعة اشفع لنا، يأتون ويتقربون لأجل أن يشفع، يتعبدون لأجل أن يشفع أو يخاطبونه بالشفاعة ويقولون اشفع لنا بكذا وكذا، أما أدع الله لنا هذه بدعة حدثت في الأمة. فكلام شيخ الإسلام صحيح أنها بدعة محدثة، وكونها بدعة لا يعني أن لا تكون شركا أكبر، فبناء القباب على القبور وسؤال أصحابها والتوجه إليها على هذا النحو الذي تراه من مشاهد والحج إلى هذه المشاهد وجعل لها مناسك كلها بدعة، نقول بدعة حدثت في هذه الأمة، وهي يعني سؤال أصحاب هذه المشاهد والذبح لها وعلى هذا النحو الموجود لم يكن موجودا في الجاهلية على هذا النحو، وإنما كانت عبادتهم للأموات على شكل أصنام وأوثان والتجاء للقبور وأشباه ذلك؛ لكن ليس على هذا النحو، فلم يكن أهل الجاهلية يحجون كالحج إلى بيت الله الحرام يحجون إلى مشهد أو إلى قبر أو ما أشبه ذلك.نقول هذه بدعة؛ لكن هل يعني أن هذا ليس شركا أكبر؛ لا؟ لأن البدع منها ما هو مكفِّر. من شريط شرح كشف الشبهات.

Здесь шейх Солих объясняет то, что под словами Шейхуль Ислама о том что это бида имеется ввиду что таких действий не существовало во времена саляф, но не то, что это нововведение, не являющееся ширком, нет это нововведение, которое является ширком! (Шейх Солих является профессионалом в понимании книг Шейхуль ислама)

الحمد لله رب العالمين بحث مُستفاد من كلام الشيخ أبي عمر السمرقندي وبعض طلبة العلم — حفظهم الله- وهذه خلاصته وتلخيصه فأقول اعلم علمني الله وإيّاك وجميع المسلمين أن من قال عند صاحب قبرٍ مثلاً: ( يـــــــا حُسين أُدْعُ الله لي أن يشفي مريضي ) أنه شرك أكبر وهذا كتابُ الله ناطق بشركية هذا الفعل قال تعالى: » إن تدعوهم لا يسمعوا دعاءكم ولو سمعوا ما استجابوا لكم ويوم القيامة يكفرون بشرككم » وقال تعالى: « ولا تدعُ من دون الله مالا ينفعك ولا يضرُّك فإن فعلت فإنك إذاً من الظالمين» وقوله تعالى: « ومن أضلُّ ممن يدعوا من دون الله من لا يستجيب له إلى يوم القيامة وهم عن دعائهم غافلون وإذا حشر الناس كانوا لهم أعداءً وكانوا بعبادتم كافرين» وقال -صلى الله عليه وآله وصحبه وسلم- : » الدعاء هو العبادة » فإن دعاء الأموات وطلب الحوائج منهم — دنيوية أو أخروية — شركٌ أكبر لا يغفره الله تعالى

Это была фатва шейха Абу Умара Ас Самаркандий о том, что просить мертвого у его могилы- большой ширк, выводящий из религии Аллаха.

وقال الشيخ ابن باز رحمه الله : » لا يجوز أن تطلب منه الشفاعة ولا غيرها كسائر الأموات ؛ لأن الميت لا يطلب منه شيء وإنما يدعى له ويترحم عليه إذا كان مسلما ، لقول النبي صلى الله عليه وسلم : « زوروا القبور فإنها تذكركم الآخرة » . فمن زار قبر الحسين أو الحسن أو غيرهما من المسلمين للدعاء لهم والترحم عليهم والاستغفار لهم كما يفعل مع بقية قبور المسلمين — فهذا سنة ، أما زيارة القبور لدعاء أهلها أو الاستعانة بهم أو طلبهم الشفاعة — فهذا من المنكرات ، بل من الشرك الأكبر » انتهى . «مجموع فتاوى ابن باز» (6 / 367)

Здесь шейх Ибн Баз также сказал, что это действие (просьба у мертвого, чтоб он попросил Аллаха) — большой ширк, выводящий из религии Аллаха.

وقال الشيخ صالح الفوزان حفظه الله : » ومن الشبه التي تعلقوا بها : قضية الشفاعة ؛ حيث يقولون : نحن لا نريد من الأولياء والصالحين قضاء الحاجات من دون الله ، ولكن نريد منهم أن يشفعوا لنا عند الله ؛ لأنهم أهل صلاح ومكانة عند الله ؛ فنحن نريد بجاههم وشفاعتهم . والجواب : أن هذا هو عين ما قاله المشركون من قبل في تسويغ ما هم عليه ، وقد كفَّرهم الله ، وسمَّاهم مشركين ؛ كما في قوله تعالى : ( وَيَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ مَا لا يَضُرُّهُمْ وَلا يَنْفَعُهُمْ وَيَقُولُونَ هَؤُلاءِ شُفَعَاؤُنَا عِنْدَ اللَّهِ ) انتهى . «الإرشاد إلى صحيح الاعتقاد» (ص 70-71)

Здесь шейх Солих Аль Фаузан говорит о том, что просить мертвых о том, чтобы они просили Аллаха это действия, за которые Всевышний Аллах вынес такфир мушрикам, которые были во время посланника Аллаха.

В действительности слова Шейхуль ислама внешне не противоречат друг другу, и некоторые из ученых объяснили что слова о том, что это нововведение означают что этого не было во время сподвижников, но не имеется в виду что это не ширк так-как Шейхуль ислам выражался так в подобного рода случаях. Также, как об этом сказали некоторые ученые, эти слова Шейхуль ислама о том что это — нововведение, противоречат его основам, что также заставило их понять из его слов что это нововведение, выводящее из религии Аллаха.

Просить у мертвых, стоя у их могил чтобы они попросили Аллаха является ширком, выводящим из религии Аллаха, даже если просящий убежден что они его слышат и это мнение более правильное, в правильности которого нет сомнения.

Я приведу несколько фатав Шейхуль ислама, которые явно указывают на то, что это- большой ширк:

شيخ الإسلام أحمد بن عبدالحليم بن عبدالسلام بن تيمية النميري الحراني الدمشقي رحمه الله في كتابه العظيم : قاعدة جليلة في التوسل والوسيلة (ص/18) [ وهو في مجموع الفتاوى (1/158-160) ] : » والمشركون من هؤلاء قد يقولون إنا نستشفع بهم أى نطلب من الملائكة والأنبياء أن يشفعوا . فإذا أتينا قبر أحدهم طلبنا منه أن يشفع لنا فإذا صورنا تمثاله — والتماثيل إما مجسدة وإما تماثيل مصورة — كما يصورها النصارى فى كنائسهم قالوا فمقصودنا بهذه التماثيل تذكر أصحابها وسيرهم ونحن نخاطب هذه التماثيل ومقصودنا خطاب أصحابها ليشفعوا لنا إلى الله . فيقول أحدهم : يا سيدى فلان أو يا سيدى جرجس أو بطرس أو ياستى الحنونة مريم أو يا سيدى الخليل أو موسى بن عمران أو غير ذلك = اشفع لى إلى ربك . وقد يخاطبون الميت عند قبره سل لى ربك أو يخاطبون الحى وهو غائب كما يخاطبونه لو كان حاضرا حيا . وينشدون قصائد يقول أحدهم فيها : يا سيدى فلان أنا فى حسبك ، أنا فى جوارك اشفع لى إلى الله ، سل الله لنا أن ينصرنا على عدونا ، سل الله أن يكشف عنا هذه الشدة ، أشكوا إليك كذا وكذا فسل الله أن يكشف هذه الكربة . أو يقول أحدهم : سل الله أن يغفر لى . ومنهم من يتأول قوله تعالى : ( ولو أنهم إذ ظلموا أنفسهم جاءوك فاستغفروا الله واستغفر لهم الرسول لوجدوا الله توابا رحيماً ) . ويقولون : إذا طلبنا منه الإستغفار بعد موته كنا بمنزلة الذين طلبوا الإستغفار من الصحابة . ويخالفون بذلك إجماع الصحابة والتابعين لهم بإحسان وسائر المسلمين . فإن أحداً منهم لم يطلب من النبى بعد موته أن يشفع له ولا سأله شيئا ولا ذكر ذلك أحد من أئمة المسلمين فى كتبهم . وإنما ذكر ذلك من ذكره من متأخرى الفقهاء وحكوا حكاية مكذوبة على مالك رضى الله عنه سيأتى ذكرها وبسط الكلام عليها إن شاء الله تعالى . فهذه الأنواع من خطاب الملائكة والأنبياء والصالحين بعد موتهم ، عند قبورهم ، وفى مغيبهم ، وخطاب تماثيلهم = هو من أعظم أنواع الشرك الموجود فى المشركين من غير أهل الكتاب ، وفى مبتدعة أهل الكتاب ، والمسلمين الذين أحدثوا من الشرك والعبادات مالم يأذن به الله تعالى . قال الله تعالى : ( أم لهم شركاء شرعوا لهم من الدين ما لم يأذن به الله ) . فإن دعاء الملائكة والأنبياء — بعد موتهم — وفى مغيبهم وسؤالهم والإستغاثة بهم ((( والإستشفاع بهم ))) فى هذه الحال ونصب تماثيلهم ، بمعنى طلب الشفاعة منهم هو = من الدين الذى لم يشرعه الله ، ولا ابتعث به رسولا ، ولا أنزل به كتابا ، وليس هو واجبا ولا مستحبا باتفاق المسلمين ، ولا فعله أحد من الصحابة والتابعين لهم بإحسان ، ولا أمر به إمام من أئمة المسلمين وإن كان ذلك مما يفعله كثير من الناس ممن له عبادة وزهد ويذكرون فيه حكايات ومنامات فهذا كله من الشيطان . وفيهم من ينظم القصائد فى دعاء الميت والإستشفاع به والإستغاثة أو يذكر ذلك فى ضمن مديح الأنبياء والصالحين فهذا كله ليس بمشروع ولا واجب ولا مستحب باتفاق أئمة المسلمين . ومن تعبد بعبادة ليست واجبة ولا مستحبة وهو يعتقدها واجبة أو مستحبة فهو ضال مبتدع بدعة سيئة لا بدعة حسنة باتفاق أئمة الدين . فإن الله لا يعبد إلا بما هو واجب أو مستحب . وكثير من الناس يذكرون فى هذه الأنواع من الشرك منافع ومصالح ، ويحتجون عليها بحجج من جهة الرأى أو الذوق أو من جهة التقليد والمنامات ونحو ذلك … » .

это ясный, четкий текст шейх ислама что это — ширк, а то, что бида это из раздела муташабих, как об этом сказали БОЛЬШИНСТВО ученых. Я привел тексты, которые указывают на это со слов ученых и самого шейх аль ислама.

Некоторые сказали о том, что мнение шейха Усеймина и шейха Бакр Абу Зейд в том, что это не ширк, а нововведение интересно было бы посмотреть на слова шейха Усеймина и шейха Абу зейда. НИ КТО, НИ ГДЕ, НИ РАЗУ НИ КОГДА не упомянул, что эти ученые так сказали. Было бы конечно интересно взглянуть.

وقال ابن تيمية رحمه الله أيضاً في (27/72 ) : « وأما من يأتي إلى قبر نبي أو صالح ، أو من يعتقد فيه أنه قبر نبي أو رجل صالح وليس كذلك، ويسأله حاجته مثل أن يسأله أن يزيل مرضه، أو مرض دوابه ، أو يقضي دينه، أو ينتقم له من عدوه، أو يعافي نفسه وأهله ودوابه، ونحو ذلك مما لا يقدر عليه إلا الله عز وجل ، فهذا شرك صريح ، يجب أن يستتاب صاحبه فإن تاب وإلا قتل . وإن قال أنا أسأله لكونه أقرب إلى الله مني ليشفع لي في هذه الأمور، لأني أتوسل إلى الله به كما يتوسل إلى السلطان بخواصه وأعوانه ، فهذا من أفعال المشركين والنصارى ، فإنهم يزعمون أنهم يتخذون أحبارهم ورهبانهم شفعاء ، يستشفعون بهم في مطالبهم ، وكذلك أخبر الله عن المشركين أنهم قالوا : ( مَا نَعْبُدُهُمْ إِلاَّ لِيُقَرِّبُونَا إِلَى اللَّهِ زُلْفَى ) [ الزمر : 3 ] «. ىتكف متوبية قال رحمه الله في (2/224-226) : „ ومن رحمة الله تعالى أن الدعاء المتضمن شركاً ؛ كدعاء غيره أن يفعل ، أو دعائه أن يدعو الله ، ونحو ذلك = لا يحصل به غرض صاحبه ، ولا يورث حصول الغرض شبهة إلا في الأمور الحقيرة . فأما الأمور العظيمة كإنزال الغيث عند القحوط ، وكشف العذاب النازل فلا ينفع فيه هذا الشرك

Вот слова шейха Усеймина, указывающие на то, что просить мертвого, чтобы он попросил Аллаха — является большим ширком:

السؤا ل1 من سأل النبي أن يدعو له وأن يطلب له المغفرة من الله بعد موته، هل هذا شرك؟ الجواب: نعم، وهو شرك أكبر لأن النبي عليه الصلاة والسلام لا يدعى بعد موته، فطلب الدعاء من الميت، وطلب الدعاء بالإغاثة أو الاستسقاء؛ يعني أن يدعو الله أن يغيث، أو أن يدعو الله أن يغفر، أن يدعو الله أن يعطي ونحو ذلك، هذا كله داخل في الدعاء في لفظ الدعاء والله جل وعلا قال وَأَنَّ الْمَسَاجِدَ لِلَّهِ فَلَا تَدْعُوا مَعَ اللَّهِ أَحَدًا[الجن:18]، والذي يقول إنّ هذه الصورة وهي طلب الدعاء تخرج عن الطلب الذي به يكون الشرك شركا فإنه ينقض أصل التوحيد كله في هذا الباب، فكل أنواع الطلب؛ طلب الدعاء يعني طلب الدعاء من الميت، طلب المغفرة من الميت، أو طلب الدعاء من الميت أن يدعو الله أن يغفر، أو طلب الإغاثة من الميت أو طلب الإعانة أو نحو ذلك كلها باب واحد هي طلب، والطلب دعاء، فداخلة في قوله تعالى وَمَنْ يَدْعُ مَعَ اللَّهِ إِلَهًا آخَرَ لَا بُرْهَانَ لَهُ بِهِ فَإِنَّمَا حِسَابُهُ عِنْدَ رَبِّهِ إِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الْكَافِرُونَ[المؤمنون:117]، وفي قوله وَأَنَّ الْمَسَاجِدَ لِلَّهِ فَلَا تَدْعُوا مَعَ اللَّهِ أَحَدًا، وفي قوله وَالَّذِينَ تَدْعُونَ مِنْ دُونِهِ مَا يَمْلِكُونَ مِنْ قِطْمِيرٍ[فاطر:13]، ونحو ذلك من الآيات، فالتفريق مضاد للدليل. ومن فهم من كلام بعض أئمتنا التفريق أو أن هذا طلب الدعاء من الميت بدعة لا يعني أنه ليس بشرك؛ بل هو بدعة شركية؛ يعني ما كان أهل الجاهلية يفعلونه، وإنما كانوا يتقربون ليدعو لهم، لكن أن يطلب من الميت الدعاء هذا بدعة ما كانت أصلا موجودة، لا عند الجاهليين ولا عند المسلمين، فحدثت فهي بدعة ولاشك، ولكنها بدعة شركية كفرية وهي معنى الشفاعة، إيش معنى الشفاعة التي من طلبها من غير الله فقد أشرك؟ الشفاعة طلب الدعاء، طلب الدعاء من الميت هو الشفاعة. المصدر شرح العقيدة الطحاوية الشريط الثامن الدقيقة 1س26د * * * *

السؤال 2 هناك بعض الناس في بلاد أخرى يأتون إلى بعض الناس يزعمون أنهم أولياء فيطلبون منهم أن يدعوا لهم الله عز وجل فما حكم هذا العمل؟ الجواب إذا أتى إلى ميت؛ ولي أو نبي أو نحو ذلك فطلب منه أن يدعو الله له؛ يعني قال: يا فلان أدع الله لي. هذا ميت، هذا هو معنى الشفاعة فمعنى طلب الشفاعة من الميت طلب أن يدعو الله له، أن يسأل الله له، فإذن قول القائل للميت أدعو الله لي، أو يأتي للنبي صلى الله عليه وسلم( خارج الحجرة والأسوار ويقول يا رسول الله أدع الله لي أن يرزقني بكذا، ومعنى هذا اشفع لي بهذا المطلب، لهذا معنى أدع الله لي اشفع، وحكمها حكم الشفاعة وقد مر معنا في هذا الكتاب أنّ أولئك ما قصدوا إلا الشفاعة، وهم حين يتقربون للموتى يريدون في النهاية أن الموتى يشفعون لهم إذا طلبوا منهم شيئا، فيأتي يذبح له ينذر له في المواسم بين الحين والآخر لظنه أن هذا الميت أو هذا الولي أو هذا النبي أو هذا الجني أو إلى آخره يعرفه بأنه يتقرب إليه، فإذا سأله عند حاجته فإنه مباشرة يرفع حاجته ويدعوا له ويطلب له ما سأل؛ لأنه يتقرب إليه، فهم ما عبدوا إلا للقربى، ولا ذبحوا ولا نذروا ولا استغاثوا ولا عملوا هذه الأشياء بأنواع العبادات إلا لأجل أن يُشفع لهم يعني أن يشفع لهم من سئل. فإذن من طلب من الميت أن يدعو له هذا معناه أنه طلب منه أن يشفع له والشفاعة لا تصلح إلا لله. المصدر شرح كشف الشبهات الشريط 3 الدقيقة 1س3د . قال ابن تيمية في اقتضاء الصراط المستقيم ( 2/708 ) : ومن رحمة الله تعالى أن الدعاء المتضمن شركًا كدعاء غيره أن يفعل , أو دعائه أن يدعو ونحو ذلك – لا يحصل غرض صاحبه ولا يورث حصول الغرض شبهة إلا في الأمور الحقيرة …“انتهى.

Эти фатвы шейха Усеимина привели некоторые арабские братья. Вот фатва шейха Абу Зейда, он был спрошен о просьбе мертвого, чтобы он попросил Аллаха не находясь возле могилы

قال فضيلة الشيخ بكر بن عبد الله أبو زيد رحمه الله : (( سؤال حي لميت وهو غائب عن قبره بأن يدعو الله له . وهذا النوع لا يختلف المسلمون بأنه شرك أكبر ، وأنه من جنس قول النصارى في مريم وابنها ـ عليهما السلام ـ بدعائهما وأنهما يعلمان ما يفعله العباد حسب زعم النصارى ))

А вот фатва шейха Абдуль Латыфа Али Шейха о том, что это действие является большим ширком:

وقال الشيخ عبد اللطيف آل الشيخ»» ولو قال يا ولي الله اشفع لي، فإن نفس السؤال محرم، وطلب الشفاعة منهم يشبه قول النصارى، يا والدة الإله ا شفعي لناإلى الإله . وقد أجمع المسلمون أن هذا شرك ، وإذا سألهم معتقداً ت أثيرهم من د و ن ه فهو أكبر وأط م «.((البراهين الإسلامية)).

Очень очевидна слабость этого мнения, даже если его предпочли некоторые ученые опираясь на муташабих из слов ибн Таймии, и оставив явные его слова. Многие из ученых сказали, что под словом бида у ибн таймии имеется в виду то, что этого не было во время саляф, а не то, что это не куфр, и доводы очевидны как ясный день. Единственное, что они могут сказать, что это мнения ученых, но у них нет доводов из Курана и Сунны.

А вот фатва шейха Абдуль Гани Ад Дахляви, он тоже сказал что это большой ширк:

ويقول الشيخ عبدالغنى الدهلوي كما في رسالةالتوحيد(ص/ ٦٥- …) بعض الناس فيقولون : „يا سيدنا ادع الله لنا يقضى حاجاتنا…“ ويظنون أنهم ما أشركوا فإنهم ما طلبوا منه م قضاء ا لحاجة أي أنهم لم يقولوا اقض حاجاتنا وإنما طلبوا منهم الدعاء أي الشفاعة وهذا باطل … فإنهم وإن لم يشركوا عن طريق طلب قضاء الحاجة فإنه م أشركوا عن طريق النداء إذ أن مجرد مناداة الميت أو الغائب تعد دعاء وصرف الدعاء إلى غير الله شرك بالاتفاق».اهـ

Так же, мнение о том, что это не ширк, предпочел Ясир Бурхами, как это не странно.

Мир и благословение нашему пророку, его семье и всем его сподвижникам.

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